हॉन्ग कॉन्ग का हंगामा

हॉन्ग कॉन्ग में कोई दो महीने से लाखों लोग सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं। सोमवार को प्रदर्शनकारियों ने हॉन्ग कॉन्ग हवाई अड्डे पर विमानों का परिचालन ठप कर दिया जिससे दुनिया भर में सनसनी फैल गई।

हॉन्ग कॉन्ग में हंगामे की जड़ में है प्रत्यर्पण विधेयक, जिसमें प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति चीन में अपराध करके हॉन्ग कॉन्ग में शरण लेता है तो उसे जांच प्रक्रिया में शामिल होने के लिए चीन भेज दिया जाएगा। यह बिल पास हुआ तो चीन को उन क्षेत्रों में भी संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति मिल जाएगी, जिनके साथ हॉन्ग कॉन्ग के समझौते नहीं हैं। जैसे आरोपित व्यक्ति को ताइवान और मकाऊ में भी प्रत्यर्पित किया जा सकेगा। जून में इस बिल को पास करने की कोशिश की गई तो इसका जबरदस्त विरोध शुरू हो गया। हॉन्ग कॉन्ग की चीफ एक्जिक्यूटिव कैरी लैम ने जनता के भारी विरोध को देखते हुए 15 जून को बिल को अस्थायी रूप से निलंबित करने का ऐलान किया। लेकिन आंदोलनकारियों की मांग बिल को सिरे से रद्द करने की है। उनकी दलील है कि इसके पास होने का अर्थ होगा हॉन्ग कॉन्ग के लोगों पर चीनी कानून लागू होना, जिसके बाद चीन मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में लेगा और यातनाएं देगा। हॉन्ग कॉन्ग सरकार का कहना है कि नया कानून केवल गंभीर अपराध करने वालों पर ही लागू होगा और इसे पारित नहीं किया गया तो हॉन्ग कॉन्ग अपराधियों का अड्डा बन जाएगा। यह भी कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बोलने और प्रदर्शन करने की आजादी से जुड़े मामलों में नहीं अपनाई जाएगी। लेकिन लोग मानने के लिए तैयार नहीं हैं और अब तो वे सीधे कैरी लैम का इस्तीफा मांगने लगे हैं।कैरी लैम की छवि हॉन्ग कॉन्ग की राजनीति में चीन समर्थक नेता की है। 1997 में ब्रिटेन और चीन के बीच हुए समझौते से चीन को अपना यह पुराना द्वीप वापस मिला। समझौते में ‘एक देश-दो व्यवस्था की अवधारणा के साथ हॉन्ग कॉन्ग को अगले 50 वर्षो के लिए अपनी स्वतंत्रता के अलावा सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था भी बनाए रखने की गारंटी दी गई है। विदेश और रक्षा को छोड़कर अन्य सारे अधिकार उसे मिले हैं। इससे हॉन्ग कॉन्ग चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बन गया है, जिसके पास अपनी बहुदलीय व्यवस्था है। अपने विशेषाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए हॉन्ग कॉन्ग के पास अपना एक छोटा संविधान है, जिसे बेसिक लॉ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सार्वभौमिक मताधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिए अपना मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुनना है। लेकिन निर्धारित चयन प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं हो रहा है और चीन अपने मनपसंद लोगों को इस पद पर बिठाने में सफल हो जा रहा है। शी चिन फिंग के आने के बाद से हॉन्ग कॉन्ग पर चीन का नियंत्रण बढ़ा है और उसकी स्वायत्तता में सेंध लग रही है, जो वहां के लोकतंत्र समर्थकों को मंजूर नहीं है। यह रस्साकशी क्या रूप लेती है, इस पर पूरी दुनिया की नजर है।

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