दादी 

आकृति विज्ञा ‘अर्पण’…
वही दादी
जो बैठी रहती है
माहवारी के दिनों में
गर्म पानी का थैला लेकर
या जब मोलू हुआ था
महरी के तनिक देर करने पर
खुद मीजने लगती थी प्रसूता को
या फिर वो दादी
जिसने पता नहीं चलने दिया
कि माँ बनने के बाद
कितना कठिन है बच्चे पालना
या वो दादी जो खुद लग जाती
प्रौढ़ बेटे के भगंदर के इलाज में
असल में उसे क्या पता
मर गयी होती अचानक
तब नसीब होते आँसू
दादी को निचोड़कर हमने
छोड़ दिया उस वक्त
जब परीक्षा थी
हमारे कृतज्ञता की
हम कृतघ्न और घिनौने लोग
कर ही क्या सके
दादी के थूक ,कफ ,
मल मूत्र से घिन करने के अलावा………
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