अलवर

अमिताभ दीक्षित,एडिटर-ICN ग्रुप तमाम उम्र ज़िन्दगी की ख़ाक छानता वक़्त से बातें करता एक बूढ़ा झुर्रियोंदार चेहरा उदासी की देहरी लांघती आंखों में सपने जैसा बसा यह शहर अलवर अंधियारी रात में दूर टिमटिमाता दिया एक पूरी दास्तान छिपाये है अपने पीछे एक अलसाये लावण्य की, वीरता की और रंगभरी मस्तियों की ख़ामोशी जब ख़ुद से बातें करती है तभी यह शहर अचानक नींद से जाग उठता है सुर्खियां इसकी आदत में शुमार नहीं सुबह की पहली किरण के साथ तेज़ हो जाती हैं कुयें की धिर्री की आवाज़ें फिर…

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अधूरा अंत

सत्येन्द्र कुमार सिंह, एडीटर-ICN UP    छुपे जो राज़ मन में, उसे दिखाने की तरकीब ज़रा बताओ ना । जो हक समझता हूँ तुम पर, उसे जतलाने की तरकीब जरा बताओ ना । आत्मा तक महसूस करता मै तुम्हे और करीब लाने की तरकीब ज़रा बताओ न । अरमान दिल के दिल तक ना सिमट जाए, अधूरे अंत से बचने की तरकीब ज़रा बताओ ना ।

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जिऊतिया विशेष

 आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ खपड़हवा घरे के अरगनि बतावति रहे कि अम्मा ( ईया) के हाली जिऊतिया भूखल रहली। सब माई धिया पूतवन के जिऊतिया के बधाई बा। भिनसहरवें सगरी बदे माई जगावेली स । भल हमनो जस जस बड़वर ( देहीं से उमिर से ) हो तानी जां ओईसे ओईसे एक्को बतियो न तर डालेनी सन। हमें होस परत बा जे चारो भाई बहिन जाईं सरधा के अम्मा ( पूने वाली ) के बोलावे बड़का बाऊ जी के घर के पिछवारे से होत के छोटकी देवालि फांगि के जाईं सन…

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जयपुर

अमिताभ दीक्षित ,एडिटर-ICN   एक बार कुछ खण्डहर हो गई इमारतें आपस में बतियाने लगीं उनकी बातें हवाओं ने सुन ली और कानां कान खबर लोगों तक पहुँची लोग दौड़े आए, बेतहाशा और एक शहर फिर से बस गया – जयपुर पत्थरों की कानाफूसी हवाओं की संगदिली इंसान के कारोबारी हाथ सब एक जगह इकट्ठा हो गए राजपूती शान के साए में इतिहास का नकदीकरण है यह शहर वक़्त खामोशी से सुनता रहा छीजता रहा – धीरे-धीरे बाद में हवा महल के कंगूरे पर खड़ा हो ज़ोर से खिलखिला पड़ा यह…

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मेरा भारत महान है

सत्येन्द्र कुमार सिंह, संपादक-ICN U.P.  कृतिदेव यहां मैं एक इन्सान हूँ एक बाशिन्दा हूँ, धरती के शान का अपने भारत महान का। कभी-कभी मेरे मन में एक भूचाल आता है, एक प्रश्न कौन्धता है, एक सवाल आता है कि क्या मैं इसे महान बनाने के लिए कुछ कर सकता हूँ? या सच पूछिए तो कदम भी बढ़ जाते हैं खुद-ब-खुद, किन्तु यह खेल तो है चन्द पलों का, और ये बढ़े कदम लौट आते हैं। सड़क किनारे, भूखे-प्यासे बिलखते शिशु को देखता हूँ तो हृदय मेरा भी रोता है, सहायतार्थ…

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अधूरा अंत

सत्येन्द्र कुमार सिंह, एडीटर-ICN UP  छुपे जो राज़ मन में, उसे दिखाने की तरकीब ज़रा बताओ ना । जो हक समझता हूँ तुम पर, उसे जतलाने की तरकीब जरा बताओ ना । आत्मा तक महसूस करता मै तुम्हे और करीब लाने की तरकीब ज़रा बताओ न । अरमान दिल के दिल तक ना सिमट जाए, अधूरे अंत से बचने की तरकीब ज़रा बताओ ना ।

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ज़िन्दगी फुटपाथ पर

अमिताभ दीक्षित, एडिटर-ICN  मेरे छू देने से जो सरासरा सी उठती है तमन्ना है कि उसके जानिब कोई अफसाना कहूं कुछ ऐसी बात बहुत नजदीक से छू ले उसे कुछ ऐसे लफ्ज़ जो जा बैठे हैं उसकी पलकों पर पंछियों के शोर से सुबह की सुगबुगाहट  आए नींद अभी बाकी हो लैंप पोस्ट  बुझ जाए और जिंदगी  उनींदी सी करवट बदल के सो जाए……….थोड़ी देर और……….. थोड़ी देर बाद फिर ताके यूं टुकुर टुकुर डूबते तारों की चमक आंखें मिचियाए बुरा  सा  मुंह बना के उठ बैठे फेंक  के चादर कूद चारपाई से तेज कदमों से गली…

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मोसूल

अमिताभ दीक्षित,एडिटर-ICN  यह महानगर एक दीवार है खंडहरों की जिसके उस पार डूब जाता है सूरज हर रोज़ गहरे काले स्याह अँधेरे चट्टानों की मानिंद खड़े हो जाते हैं आँखों में हर रोज़ बस्तियां न खुद से बात करती हैं न खामोशी से धुआं भरे कसैले जुबां के जायके इंतज़ार करते हैं निवालों का कोई कुछ नहीं कहता मगर डरता है सन्नाटों से ……और धमाकों से अब भी उसूलों के लिए लड़ी जा रही जंग में कोई उसूल बचा नहीं रह गया चीखें ………………..नहीं सिसकियाँ ……………..नहीं मरती सांसें …………..नहीं लाशें…

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शुभकामनाएं मनुष्य होने की

अखिल आनन्द, ब्यूरो चीफ-ICN UP   वृक्ष से पत्ता अलग होकर बहुत खुश होता है, हवा में लहराता है, अपनी आज़ादी का अनुभव करता है, लेकिन इस बात का एहसास उसे बाद में होता है कि उसका अस्तित्व वृक्ष से लगे रहने मे ही था। फूलों की खुशबू, ठंडी बयार, उम्मीदों की रौशनी और भविष्य की योजनाएं, कुछ मीठा कुछ नमकीन,पुराने गमों और दर्द पर उपर से नई चादर ओढ़कर फिर से आ गया नव वर्ष। सुबह  की धूप भी वही है,वही सड़के हैं,वही घर और वही लोग, बदला है तो सिर्फ एक एहसास। कुछ…

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आंकड़ें जीवन नहीं होते

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप  जैसे सारे कोमल कोमल बच्चे बन गये हैं उस बड़ी मशीन के छोटे छोटे पुर्जे जिसमें पहले से ही भरा है दुनिया का समूचा प्रबंध तंत्र! ओह! यह कैसा छल है, यह कैसा षड्यंत्र!! इस मशीन में भरा जाता है बचपन और किशोरावस्था के स्वप्नों का ताजा लहू, मुलामियत से भरी लचीली देह के, सूख कर लकड़ी बन जाने तक का पूर्व नियोजित श्रम और नित्य की अरुचिकर जूझन एवं उनसे उपजी हताशा और निराशा और बदले में मशीन उगलती है मात्र असीमित प्रोद्योगिकी…

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